Tuesday, May 06, 2008

बेशर्म लौ

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मोमबत्ती की रौशनी से नहायी खाने की मेज़ पर
तुम्हारे होने भर से सबकुछ जीवन्त सा था
धड़कनों की टाप बढ़ाता रात का वो किस्सा
कुछेक क्षणों में सिमटते हुए अनन्त सा था

बाती छोड़ती हुई सी मोमबत्ती की बेशर्म लौ
तुम्हारी आँखों में ही टिमटिमाती थी
गालों पर बस हल्की सी लालिमा जताने को
रौशनी स्वयँ सकुचाती थी

पानी की खुशकिस्मत सी वो पतली परत
तुम्हारे होठों पर ही ठहर जाती थी
बेशर्म लौ इठलाती सी रहती उनपर
बाती जल-जल कर बस पछताती थी

कानों में मचलते हुये दो छोटे झुमके
अपनी अनवरत सी तड़प की कहानी बतलाते थे
बीच-बीच में छिटकती बेशर्म लौ से लड़ने को
निरीह से इधर-उधर कसमसाते थे

शीशे के गिलास में छलकता सजीव सा पानी
बेशर्म लौ की लालिमा में शर्माता था
छोटे घूँटों के बहाने होठों से लगकर शीशा
हर बार बस चकनाचूर हो कर रह जाता था

शरारती आँखों पर सवार दो काली भौँहें ही
बला सी तनकर बेशर्म लौ को ललकार पाईं
सब कुछ देख मुस्कुराती स्पष्ट सी तुम्हारी रूपरेखा
जाने कब हृदय को किस नगर छोड़ आईं!