Sunday, March 29, 2020

वो

“आज ही है। शाम को सात बजे। जाकर तमन्ना पूरी कर लेना।”

“तुम्हें कैसे पता बे?”

“अमा यार, कहते हैं तो सुना करो। गर्ल्स हौस्टल की गतिविधियों का थोड़ा-बहुत ज्ञान हम भी रखते हैं।”

“हाँ तुम बहुत्ते तीरंदाज़ हो, इसीलिए आज तक यूनिवर्सिटी में अकेले घूमते हो। भईया ई शहर है बम्बई। यहाँ हर आदमी कुछ न कुछ पा जाता है। और तुम साले ज्ञान के अलावा और कुछ न पा पाए!”

“बेटा थोड़ा संभाल के। जिसका डाँस देखने के लिए तीन दिन से आँख में गुलाबजल डाले पड़े हो वो 24 में से 28 घण्टे लाईब्रेरी में ही होती है। तुम्हारे जैसे चौपाटी पर ले जाकर प्रपोज करने वाले दिलफेंक लौण्डे उसकी लीग में नहीं हैं।”

“हाँ हाँ भईया तुम बटोरो भरपूर ज्ञान, और करो उसकी लीग की सोलो-स्वान मौडलिंग। एक्स्ट्रा मिर्च डाल कर चौपाटी की पाव-भाजी लड़कियों को कितना भाती है ये तुम नहीं समझोगे।”

“हाँ यूनिवर्सिटी से निकल कर तुम चौपाटी पर ही पाव-भाजी बेच लेना। हम अभी निकलते हैं।”

“कहाँ निकलते हैं भईया? पौने सात बजे एण्ट्री कौन कराएगा? पढ़े-लिक्खे लौण्डे ही तो काम आते हैं एण्ट्री पे!”

“नहा-वहाकर, सेंट लगाकर आना शाम को। देखते हैं।”


आज घड़ी जैसे चलने की बजाय रेंग रही थी। वह नहा चुका था, इस्त्री किए कपड़े पहने थे, और किसी सस्ती विदेशी इत्र की बोतल को कपड़ों पर उड़ेल चुका था। बालों में जैल, आँखों में गुलाबजल, और कैन्वस जूते। उसे मालूम था कि महज़ किसी तरह अन्य दर्शकों की भीड़ का हिस्सा बन जाना प्यार जतलाने के करीब भी नहीं है। पर उसे ये भी ग़ुमान था कि प्यार करने का मकसद बस प्यार जतला देना नहीं है, और शायद दूर-दूर से चाहने का लुत्फ़, पा लेने से ज़्यादा सुकूनगर है।  इस तरह बड़ी-बड़ी शायराना बातें सोचकर दिल के अंदर मचती जिस्मानी हलचल को भी कबूलने से बचा जा सकता था, वरना अपना ही प्यार छोटा लगने लग जाए। कुल मिलाकर आज उसके लिए पूरा कलीना कैम्पस हसीन था, मिज़ाज रंगीन, और ज़िन्दगी गुलज़ार। बस थोड़ा इंतज़ार बचा था, जिसकी शायराना अंदाज़ में नुमाईश कुछ बेपरवाह लिखने वाले लोग शायद कर ही डालें। पर आज रहने दीजिए साहब, क़िस्सा अभी बाकी है।

कौलेजों में पढ़ने के बाद भी अगर महिला छात्रावासों के बारे में आपकी जानकारी मुख़्तसर हो, तो समझ लें जनाब कि आपने ज़िंदगी थोड़ी-बहुत जी तो ली, पर बड़े नहीं हो पाए। ये जानना बेहद ज़रूरी है कि इस तरह की इमारतों में आपको यहाँ-वहाँ लोहे की जालियाँ ज़्यादा दिखेंगी, वैसे कपड़े सूखते देखेंगे जो आपने सिर्फ़ फ़िल्मों में देखे हों, और खुशबू के नाम पर कोई गुलबदन हसीना की महक नहीं, बू-ए-डिटर्जेण्ट ही मिलेगी। आज की महफ़िल नीचे के कौमन रूम में जमनी थी। चारों ओर गेंदा के फूलों की माला से वातावरण को मोहक बनाने की साज़िश की गई थी, शायद इसलिए कि मुल्क के हर कौलेज की तरह यहाँ भी ‘मय’ और ‘साक़ी’ सरीखे सजेस्टिव लफ़्ज़ों पर पाबंदी थी। कमसकम फूल लगा देने भर से कोई लफंगा महफ़िल से रुख़्सत होने के बाद फ़ैज़ साहब वाली डींगे नहीं हाँक पाता, कि – “न गुल खिले हैं न उन से मिले न मय पी है, अजीब रंग में अब के बहार गुज़री है!” कमरे को सजाने वाले ने अक्ल खूब लगाई होगी: गुलों को पिरो कर चारों ओर लगा ही दिया गया है, “उनको” दूर से देख लेना जब टाईम आए तब, और मय वापस घर जाकर पी लेना। शायरी हाँकने का कोई मौका नहीं! कमरे में थोड़े गुब्बारे भी थे, जिनका मकसद शायद खुदा जानता हो, या शायद वो लोग जिनके पिछ्ली पार्टी के गुब्बारे फोड़े नहीं गए थे और यहीं खम्बों पर चिपके रह गए थे।

महफ़िल में शिरकत करने वाले कद्रदान दिल थामे एक-एक करके ऐसा चेहरा बनाए अंदर आ रहे थे जैसे एक-चालीस की विक्रोली वाली लास्ट लोकल पकड़ने आए हों; छूट गई तो बाद में किसी को मुँह न दिखा पाएँगे। अंदर आने वालों में ज़्यादातन इसी छात्रावास की छात्राएँ थीं, और कुछेक लुच्चे-लफाड़े लड़के, जिनकी पढ़ने लिखने-टाईप वालों से एण्ट्री करवाने भर के लिए जिगरी दोस्ती थी। दो हसीनाएँ (या फिर उसे लगा कि हसीनाएँ) माईक पकड़े, टखनों तक लम्बी स्कर्ट पहने (या फिर उसे लगा कि ये स्कर्ट ही है) खड़ी थीं। माहौल बन चुका था – दर्शक-दीर्घा की छात्राओं ने तशरीफ़ें चारों ओर सीढ़ियों पर टिका लीं थीं, और छात्र पीछे की तरफ़ दीवारों से सटकर खड़े हो लिए थे, शायद इसलिए कि कभी भी अगर ऐसा लगे कि “व्यू” ठीक नहीं है, तो तपाक से जगह बदलने की फ़्लेक्सिबिलिटी बनी रहे।

एक हवा सी चली। बयार-ए-नसीम। चारों ओर ऐसा सन्नाटा जैसे परवरदिगार ने हल्के से इशारा कर दिया हो कि सारी क़ायनात दो पल के लिए थम जाए और चमन हो जाए। आँखों के आगे ऐसा मंज़र कि उसे लगा बस इन दो पलों को अपने नसीब में पाकर वो खुद शाहकार-ए-खुदा हो गया हो! सामने था वो कमाल-ए-हुस्न कि पूरी महफ़िल में अगर कुछ सुनाई दे जाए तो सिर्फ़ धड़कनें। रंग-ओ-बू का वो सैलाब कि गेंदे की उन तमाम लड़ियों में पिरोया एक-एक फूल शर्मसार हो जाए। काले ख़ुशनुमा लिबास पर पीली चुन्नी ओढ़े आई थी वो। पैरों में घुंघरू जैसे नायाब सुख़न-वर, चाल जैसे किसी कू-ए-गुलिस्ताँ से इठलाता आया हो एक मोर। आँखों में सूरमा, कानों में सोने की चमकती बालियाँ, नागिन सी लहराती काली घनी ज़ुल्फ़ें। वक़्त कब का थम चुका था, और उसे लगा कि बस अब दिल का थमना बाकी है। ऐसी ख़ुशगवार बातें उसके ज़ेहन में उफ़ान ले रही थीं, तभी किसी ने पीछे से सीटी बजाई। पूरी महफ़िल तालियों से थर्रा उठी, और उसे लगा कि अब ख़्वाब से बाहर आ जाना अच्छा रहेगा; ये मंज़र एक्स्क्लूसिव बिल्कुल नहीं है, और इंसान को अपनी औकात नहीं भूलनी चाहिए।

आगे जो हुआ उसे वो बस ठिठककर देखता रह गया। लबों से छिटकती तबस्सुम की सरकशी, आँखों के इशारों की ख़लिश, और वो बेहतरीन अंदाज़-ए-बयाँ कि मोम बिन आग ही पानी हो जाए। इधर वो लहरों की तरह बहकती, उधर भीड़ बेताब हो मचलती। उसे लगा कि इस समंदर तक वो आ तो गया, पर अब डूब जाएगा। इन मदहोश हवाओं में उड़ पाने का ज़र्फ़ जिन परिंदों में है उनके नाम शायद लाईब्रेरी की उन किताबों की जिल्द पर लिखे होते हैं जिनकी सूरत इसने तो कभी नहीं देखी। इसी उधेड़बुन में था कि आवाज़ आई – “हैलो!” हसीनाएँ सभी से हैलो बोलती हैं ये तो उसने सुना था, पर उससे वो हैलो बोलेगी ये नहीं सुना था।


“और हीरो! हम तो तुम्हारी एण्ट्री करवा के निकल गए थे, पर सुना है बड़ा हाय-हैलो कर आए हो आज?”

“हाहा! हाँ! अच्छा ख़ैर, आज ओल्ड मौंक से काम नहीं चल पाएगा। कुछ अँग्रेज़ी पीओगे? एक-आध पैग लगा लेना मेरे साथ फिर चले जाना अपने लेनिन और कार्ल-मार्क्स को पढ़ने।”

“हाँ पी लेंगे। क्या कमाल करके आए हो वैसे डाँस प्रोग्राम से?”

“यार हैलो वगैरह हुआ और क्या। किसी बौयफ़्रेण्ड के साथ थी, कुछ अंग्रेज़ी में नाम था। इण्ट्रौड्यूस करवाया था; अब टेढ़ा नाम था याद नहीं आ रहा।”

“अच्छा कहाँ पीओगे?”

“वहीं। लाईब्रेरी के बाहर ऐज यूज़ुअल!”


Monday, February 10, 2020

Agency

The forecast on the phone says, “rain throughout the day”. It’s perhaps ten in the morning, maybe eleven; I am happy about not being on a clock. I step out into the balcony. It feels as if I was last here a long time ago. The sky is overcast, and it might rain as the day progresses. I notice my bougainvillea. It’s already winter, but they are blooming. I can’t recall the last time I observed them up close, or any of the other plants in the balcony for that matter; even watering them was delegated to the house cleaner months ago. Many of them have overgrown, and some have weeds as tall as I remember those plants themselves – beautiful weeds nonetheless. I see the open-air gym equipment in the opposite park; I don’t know when these were installed. When life is on a treadmill, one stops paying attention.

Until the universe jolts you back.

When my father was diagnosed with his virulent lung ailment three years ago, he was already in a phase of life where he would be irritated with himself about small things that he couldn’t manage to do: climbing a flight of stairs, going for a long walk, changing car tyres, or eating heartily at a wedding without upsetting his stomach the next day. Most of it, perhaps, is just ageing. Parts of it, maybe, is contributed by his ailments. We grew up hearing stories about him carrying an entire sack of wheat on his back, which would then be washed thoroughly, soaked in the sun, and hand-grinded in a small stone mill by my grandmother. Or about one of his childhood friends I have met several times, who still can’t hear very well with his left ear because my father slapped him hard during an altercation in his younger days. About his travels far and wide across India on shoestring budgets, and his long inter-city office commutes in rickety government buses in the then roadless state of Bihar. By talking about them more often, he seemed to long for his days of strength and vitality. He sold off his old scooter a few years ago and switched to a simpler electric-start two-wheeler because the scooter was too heavy, the engine’s ignition required arduous kicks, and the machine was getting difficult to drive. Now he drives the new two-wheeler slowly, and almost never drives his own car.

Mortality is a difficult subject. It’s not something one would pick as a conversational topic in gatherings. Nor is it something one would think deeply about over evening coffee after returning from work. And yet, it’s cognizance is all-pervasive in culture. There are tomes of eclectic prose on the inevitability of death, and plentiful exquisite poetry on the beauty of it. Somewhere, it’s associated with solemn pride, elsewhere with liberation, and in yet another context with transcendence to another life. “May you live long” is almost a universal blessing. Perhaps this assumption of the primacy of human breath isn’t completely unfounded; everything else, all the thoughts, actions, hopes, despair exist and create a living experience defined by the existence of the breath. 

However, perhaps breathing isn’t sufficient in itself. One doesn’t merely desire to live longer, but – and this is seldom acknowledged – one wants to live with agency. It’s not about how many constraints of flesh and bone can be conquered by biology to prolong health and survival, what ultimately matters is the agency left for the body to observe, think, act, share, and experience. I notice my balcony closely now. I feel my own breath, and the faint fragrance of flowers, leaves, and soil mixed with it. I feel the chill of the air burnishing my skin. It has begun raining, and the fragrances change yet again. What portent can be greater than the grace that manifests in all this abundance? And what fortune is greater than my agency to observe all this?